नहीं बदलना चाहती मैं तुम्हें
एक इंच भी
चाहे खुद बदल गई हूँ
सिर से पाँव तक
फिर भी नहीं
बिल्कुल नहीं
जब कभी सोचा ही नहीं
माँ की आदतों को बदलूँ
या पिता को थोड़ा नर्म
माँ के स्पर्श सा कर दूँ
मैंने तो बस आत्मसात किया
उनमे खुद को और
खुद को उनमें जिया
फिर क्यों ????
तुम्हें बदलने का
विचार भी लाऊं ?
जैसे उन्हें निभाया है
तुम्हें भी खुद में समाऊँ । ।
नहीं बदलना चाहती मैं तुम्हें
एक इंच भी ........
माना तुम बहुत
बहुत निष्ठुर हो
मेरे लिए उजालों में भी
अंधेरा ढूंढ लाते हो
तानो से कर देते हो
छलनी मेरा सीना
और सागर भर रुलाते हो
लेकिन फिर भी
नहीं बदलना चाहती मैं तुम्हें
एक इंच भी .......
तुम मेरा वो हिस्सा हो
जो जीवन के कठोर
सचो को मेरे समक्ष
नंगा कर देता है
घृणित हर वस्तु से
रिश्ता पक्का कर देता है
तो क्यों ना जीऊँ
माँ के प्यार और
पिता की छाँव से
तुम्हारे सच्चे अप्रिय
प्रेमरहित वजूद को
हाँ फिर भी
नहीं बदलना चाहती मैं तुम्हें
एक इंच भी .....
' सच्चे अप्रिय प्रेमरहित वजूद ' मैं आपने क्या कुछ नही लिख दिया.... तो ' सच्ची प्रिय प्रेमसहित अनुपस्थिति ' पर भी कुछ लिखिए ..... आपकी ये पंक्तियाँ अपना उद्देश्य बखूबी बयां कर रही हैं ।
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