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Sunday, 7 June 2015

ओ मेरे राम

और नहीं ,अब और नहीं
सुन लो बस अब और नहीं
पूज पाऊँगी तुमको मैं
ओ मेरे राम......
तुम जन्मों के अर्थ हुए
हम जीवन भर व्यर्थ हुए
अटके रहे देह में प्राण
ओ मेरे राम......

बचा लिया था तुमने जब
रावण के मुझे घेरों से
फ़ेंक दिया फिर क्यों मुझको
निर्जन वन के डेरों में
मान बने बस तुम मेरा
पर लव कुश अभिमान हुए
ओ मेरे राम......

आज भी वन में बसती हूँ
अपनी इच्छाएँ डसती हूँ
एक नहीं ढेरों रावण अब
अपनों से भी डरती हूँ
बोलो अब कब आओगे
ख़त्म करने ख़ूनी कोहराम
ओ मेरे राम....

इस बारी जो आओगे
सोच लो फिर ना जाओगे
सीताओं की भीड़ लगी
रावणों की जंजीर कड़ी
धरती माँ की कोख में भी
अब ना बचा मेरा स्थान

ओ मेरे राम........

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