Search This Blog

Sunday, 7 June 2015

प्रबल भाव जल हुए

प्रबल प्रबल प्रबल हुए
ये भाव फिर से जल हुए
बढ़ चलें हवा के संग
जो आज थे वो कल हुए

ना सिंह से गरज पड़े
ना मेघ से बरस पड़े
बिंदु सरुपी देह ले
कीड़ी का धैर्य धर चले
प्रबल प्रबल प्रबल हुए
ये भाव फिर से जल हुए

अंबर सरीखे पुष्ट हो
काली के जैसे रुष्ट हो
धड़ धड़ गिराते जाएंगे
अंगद से हम अचल हुए
प्रबल प्रबल प्रबल हुए
ये भाव फिर से जल हुए

हिमालय से हरे हुए
फल फूल से सजे हुए
हर राम की थाली में हम
शबरी के बेर रख चले
प्रबल प्रबल प्रबल हुए
ये भाव फिर से जल हुए

ये तितलियाँ चहक उठी
लो मछलियां भी उड़ चली
हर नर मगर की कोख में
नारी जलज प्रखर हुए
प्रबल प्रबल प्रबल हुए
ये भाव फिर से जल हुए

शोलों में अश्रु दहकेंगे
सब युवा फिर से बहकेंगे
लिए प्रेम की मशाल ये
भिन्न भिन्न से अब जुगत हुए
प्रबल प्रबल प्रबल हुए
ये भाव फिर से जल हुए









No comments:

Post a Comment