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Sunday, 7 June 2015

मेरे पापा


क्या इन यादों के लिए
कोई शब्द भी हैं ?
या इस पीड़ा के लिए
कोई मरहम ??
मैं आपको खोजती हूँ
जाने कहाँ - कहाँ  ??

आप मृत्यु शया पर सज कर
कब के जा चुके हो !!
ये यकिन दिलाऊं भी
तो कैसे मैं खुद को ??

आईना देखती हूँ तो
पाती हूँ -----
वही आँखे....
हाँ " पापा " आपकी
वही आँखे ......
जिनसे नजरें मिलाना
मुझे पाप लगता था
आज चिपकी हैं
मेरी ही आँखों पे ....

खुद को मुस्कुराते
देखती हूँ तो....
महसूस होता है जैसे
जैसे....
ये वही हुबहू चेहरा है
आपका !!!!!!
मुस्कुराता चेहरा ....।।

जब कभी बच्चों को
झिड़कती हूँ झूठे
तो लगता है ये डांट.....??
ये तो वही डांट है
जो कई बार आपने
मुझे सुनाई थी झिड़कियों में ....।।

मैं आपकी एक झलक नहीं
पूर्ण व्यक्तित्व बन चुकी हूँ
मेरे हाथ -पैर ..
और उनकी सूजन भी....
उठना - बैठना - चलना
और खीजना भी.....
हाँ आप ही तो हैं
मेरे भीतर -मेरे भीतर
साँसे ले रहे हैं ....
हैं ना ?????

जानते हैं " पापा "
नहीं देखती हूँ मैं
खुद को रोते हुए
क्योंकि आपकी ये लाडो
नहीं देख पाएगी
आपको खुद में
रोते हुए......
नहीं देख पाउंगी मैं
आपको रोते हुए .......

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