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Tuesday, 4 March 2014

सार्थक 

मात्र दशमलव
जितने ही
तो थे तुम
जब पहली बार
मिले थे हम ।।
आज ही की तरह
अदभुत्
अनुपम, निश्छल
सौंदर्य से
परिपूर्ण ।।

रोज मैं 
मुठ्ठी भर धूप
और अंजुली 
भर छाँव
चुराती थी
फिर उसमें
जल और
अपना रक्त
मिलाती थी
सबकी नजरों
से बचा के
आहिस्ता-आहिस्ता
तुम तक पहुंचाती थी ।।

फिर तुम
लेने लगे आकार
हौले-हौले
मेरा स्वप्न
होने लगा साकार
हर क्षण
दो आँखें
मुझसे बतियाने लगीं
और नन्हे हाथ पैरों
की क्रीड़ा
मुझे रिझाने लगी ।।

जब आया
प्रथम अवसर
तुम्हें निहारने का
असहनीय पीड़ा ने
भी दिया मुझे
गौरव आनन्द
तुम्हें पाने का ।।

सम्पूर्ण प्रकृति 
झूम उठी थी
थिरकने लगी 
थी हवाएँ
वृक्ष गीत 
गा रहे थे
और पल्लव
दे रहे थे दुआएँ ।।

अब तुम 
हो गए हो
मेरी हर 
सांस में शामिल
तुमने ही 
बनाया है मुझे
जीवन जीने के काबिल
सीखा दिया है
तुम्हारे लड़खड़ाते
क़दमों ने 
मुझे चलना
और तुम्हारे
विकसित होने 
के प्रयासों ने 
बता दिया है
मुझे लड़ना ।।

पल-पल बढ़
रहा है अब
तुम्हारे कद
के साथ
मेरा भी बल
और रोज तुम 
अनकहे शब्दों
में कह जाते हो -
"
माँ चल, अब ना थम
ले हाथों में हाथ
तेरा सार्थक है संग " ।।

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