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Sunday, 7 June 2015

अमर हूँ

धुँआ धुँआ उड़ती रही मैं
तेरे हर एक कश पर
की फेफड़ों को संभाले रखना
मैं धीमा जहर हूँ

नसों में बहता वो दलदल हूँ
जो धंसा रहा है तुझे-तुझमें
आहिस्ता आहिस्ता

मुझे कोई नाम भी ना देना
की मैं उपजी हूँ
नाजायज कोख से

Don't try to teach me
and feed me because,
मैं जन्म से नवजात नहीं मंथरा हूँ

मुझे मिटाने के सारे प्रयास, ध्यान ,
योगा , सदविचार
'
जीरो' नंबर से फेल हैं

रामायण को रचने वाली
पोसने वाली महाभारत को
दुर्योधन की फटी जंघा का
मांस मैं ही हूँ

मैंने धत्ता बताया है हर कानून,
गांधी के सत्य और अहिंसा को
दो देशों के बीच की तलवार
मैं ही हूँ

मैं तुम्हारी अपनी अजन्मी, पुष्ट,
लालसी ईर्ष्या........
अजर और अमर


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