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Sunday, 7 June 2015

शून्य

तुमने कहा था
एक दिन.....
हमारा प्रेम आईना होगा ! !
और यूँ ही
यथार्थ के टुकड़ो
को चुनकर
मैंने एक शीशमहल बना लिया

जिसमें हमारा प्रेम
आराम कर सके....
कल्पना की ऊँची
उड़ान भर सके...
एक दूजे के भीतर
झांक कर समाप्त कर दे
असमानता के दायरों को...

मैं सच मान बैठी थी
"
हाँ" सच....
मैं सच मान बैठी थी की
प्रेम पारदर्शी होता है ! !
लेकिन तुम्हारे एक पत्थर ने
मेरे शीशमहल के साथ
मेरे प्रेम और विचारों को
चूर-चूर कर दिया....
और पीछे छूट गया है बस
एक शून्य.....
आह ! बस एक शून्य ! !



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