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Sunday, 7 June 2015

मेरे दो भाई मेरी दो आँखें

एक सीमा को पार कर
जब आ गया था
किशोरोवस्था का पड़ाव
तुम दोनों ने बंद कर दिया था
मेरी चोटी को खींचना
और मुझ पर जोर से चीखना
नहीं छुपाते थे तुम दोनों फिर
मेरी चीजें और चाकलेट्स
और कतराने लगे थे मुझे
गले लगाने से भी
ज़वान होती बहन
सहेजने की गुड़िया जो हो जाती है
छतों पर टापना
और बिल्डिंग से रेत पर कूदना
अब नहीं करने देते थे तुम दोनों
गली का कोई लड़का
या स्कूल का लफंडर
ना खड़ी करे मेरे लिए परेशानी
इसकी भी करने लगे थे निगरानी
तुम दोनों
और अब आज.....
जब घर आती हूँ कई- कई महीनो बाद
करते हो मेहमान जैसी खातिरदारी
तुम दोनों
नहीं लगा पाते हो अब भी
बचपन की तरह प्यार से गले
ना खींचते हो बाल
इस युवा उम्र के पड़ाव पर
रख देते हो अपने प्यार ओ
और परवाह को मेरे माथे पर
कभी हाथ तो कभी बोसे के रूप में
और पूछते हो पनीली आँखों से
कैसी है तू ????
खाना समय से खाती है की नहीं ???



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