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Sunday, 7 June 2015

इतना भावुक होना भी ठीक नहीं

जब जब सड़को पर देखा है
कोई भूखा बचपन बैठा है
मेरा दिल छलनी सा होकर
आंसुओ की धारा देता है
सच कहती हूँ तुमको हे ईश्वर
इतना भावुक होना भी ठीक नहीं......

जब जब सड़कों के ढाबों पर
कोई नन्हा फूल सुकोमल सा
ढेरों बर्तन के धोता है
जैसे मेरे ही सुकोमल हाथो से
हर लहू का कतरा बहता है
सच कहती हूँ तुमको हे ईश्वर
इतना भावुक होना भी ठीक नहीं......

जब जब माँ बाप के झगड़ो में
निर्मल मासूम निश्छल मस्तिष्क
विक्षिप्त सा बचपन सहता है
मेरे बचपन के कोनों से
हर ख़ुशी का लम्हा रोता है
सच कहती हूँ तुमको हे ईश्वर
इतना भावुक होना भी ठीक नहीं
इतना भावुक होना भी ठीक नहीं








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