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Sunday, 7 June 2015

चार दिन

चार दिन बस चार दिन 
चीखेगी ये मिडिया
रोएंगे हम लेखों में
कविताओं में
पूरा शब्दकोष उढ़ेल देंगें
दुःख की अभिवयक्ति वाला 
और फिर .........
भूल जाएंगे बाड़ ग्रस्त 
अधमरे लोगों को 
दामनी और गुड़िया
की तरह ---–----------

सरकार और कुछ अधिकारी
बना लेंगे फिर 
भव्य बंगले
घर से बेघर हुए
लोगो के नाम..........
भर जाएंगे कुछ और
बैंक एकाउंट्स
इकट्ठा हुई लाशों 
के नाम.........
पीछे रह जाऐगी
सिसकियाँ
फटे क़ागज की तरह




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