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Tuesday, 16 February 2016

Have a tea with man babu

Have a tea with man babu

रसातों की एक ख़ुशनुमा शाम , हल्का मस्ती भरा संगीत , सहेलियों का साथ और गर्म- गर्म चाय की प्यालियाँ । बात निकलती है तो दूर तक जाती है और जब महफ़िल में लेखिकाएं, कवियित्रियाँ , समाजसेविकाएँ और बोल्ड पत्रकार बैठीं हो तो किस्सों में नमक मिर्च के साथ MDH चाट मसाले का भी फ्लेवर आ जाता है । प्राय इन सब व्यवसायों से जुड़ी महिलाएं सादगी से परिपूर्ण , सूती क्ल्फ़ लगी साड़ी या सूट , माथे पर गहरी बड़ी बिंदी , गले में मोटे क्रिस्टल्स की माला में नजर आती हैं या ये कहा जा सकता है की इन व्यवसायों की पहचान ये वस्त्र हो गए हैं जैसे भगवा पहनने वाले को हम बिन पूछे साधू बाबा का दर्जा दे देते हैं , मगर आज तो यहाँ शिफान और ख़ुशबुओं की बाड़ आई हुई है । कपड़ों के सलीके और तरीके से बारिश की हर एक बूंद रंगीन नजर आ रही है ।
पार्टी की मेजबान रंजू ने अपने घर को नया ऐथीनीक इंटीरियर करवाया है । करीने से लगी पारंपरिक मूर्तियों का जमावड़ा हाल से लेकर किचन तक है ।  शेफ संजीव कुमार की किचन का लगभग हर नमूना यानि स्टाइलिश क्रॉकरी , मिक्सी ,अवन वगैरह यहाँ मेहमानो का स्वागत कर रहे हैं । कुछ – कुछ अजंता अलोरा की याद दिलाती हुईं कलाकृतियाँ शयन कक्ष को मादक रूप दे रही हैं । सबसे शानदार और देखने की चीज है उनका गोल शेप लिए शाही बेड , जिसके ठीक ऊपर हल्की नीली रोशनी बिखराता झूमर , खुले प्रणय को निमंत्रण देता प्रतीत हो रहा है । सहेलियों को अपने घर की शान - बान के साथ सैर करवाकर रंजू हाल की ओर जा रहीं हैं और हम मन बाबू के साथ चलते हैं सीधे खिड़की के रास्ते इन सखियों का बिन कैमरे - बिन माइक स्टिंग करने. ...............
मन बाबू के जन्म को लेकर आज तक कोई पुख्ता तथ्य सामने नहीं आए हैं । आखिर किसने इस विशाल संतान को धरती के हर कण में व्याप्त किया ? मन बाबू कठोर से भी कठोर जगह मिल जाते हैं और हमेशा के लिए वहाँ बोरिया बिस्तर भी जमा लेते हैं । धन्य हैं हमारे मन बाबू और धन्य है उनकी कारिस्तानियाँ ......हर कोई अपनी परिस्थितियों के लिए इन्हे ही जिम्मेदार ठहराता है और मजे की बात ये है की इनके बिना रह भी नहीं पाता है । वैसे मन बाबू भी कहाँ हर जगह टांग अड़ाने से बाज़ आते हैं !! आ .........वो रहे परदे की सिलवट पर चिपके हुए
“हाँ तो ये है मेरा नया इंटीरियर , कैसा लगा ?” रंजू अपनी गोरी खुली बाहों को हवा मे लहरा कर अपनी सहेलियों से मुख़ातिब हैं
एकदम तुम्हारी ही तरह आलीशान “
ओह ! शुक्रिया ssss  ! “ रंजू कुछ ज़्यादा ही अपने पर इतरा उठी
मुझे पता था की तुम लोग को जरूर अच्छा लगेगा । अच्छा मेरे ख्याल से इतने मस्त मौसम में हमें बाहर बैठकर चाय का लुत्फ लेना चाहिए , है न ,
हाँ क्यूँ नही .....मुग्धा और सुषमा एक साथ बोल पड़ी  
रामवती.....SSSS चाय - नाश्ता बाल्कनी में शिफ्ट कर दो और सब मैडम्स के लिए यहीं चेयर डाल दो” घर का चक्कर लगाते हुए वो सबके चेहरों पर आए भाव देखकर मन ही मन बहुत प्रफुल्लित थी और अब उनको अपनी बालकनी का नजारा दिखाना चाहती थी
कम आन ग्ल्स , हैव अ टी विद रोमांटिक रेन और रामवती .....तुम आज जल्दी जा सकती हो “ सभी प्रतिष्ठित सहेलियाँ कुर्सियों पर विराजमान हो जाती है ।
रामवती फटाफट बाल्कनी में सबकुछ शिफ्ट कर देती है । वो खुश थी की आज मालकिन ने डिनर सर्व करने के लिए नहीं रोका था लेकिन इस बारिश का वो क्या करे ?? उसके पास पहनने के लिए बस दो ही साड़ियाँ थी , एक आज सुबह धोकर सूखने छोड़ आई थी , मरी बारिश ने नहला दी होगी  और दूसरी अब रास्ते में नहाने वाली है । रंजू को उसका एक ही कपड़े में दो दिन आना बर्दाश्त नहीं और रामवती के हाथ घर की जरूरतों के आगे कुछ बचता नहीं ।
रामवती बालकनी की ओर आँख उठाकर बारिश का मिज़ाज भाँपने का प्रयास करती है । घने - काले -गरजते बादल बिजलियों के रथ पर सवार दौड़ शुरू कर चुके थे , उनके रुकने के आसार दूर तक नही थे । वो एक नज़र अपनी घिसी हुई साड़ी पर डालती है और पल्लू को सीने पर खींचकर कमर मे कस लेती है । ठंडी हवा के आगोश में उसकी दोनों कंपट्टियाँ सन्न का स्वर कानो में भरती जा रही थी । देह का एक – एक रोआं त्वचा पर सलामी दे रहा था । बाहर निकलने के लिए आखिर उसका दिमाग एक गमट्टा जुगाड़ निकाल ही लेता है । वो दो प्लास्टिक पालिथीन की थैलियों को टोपी नुमा बनाकर सिर पर पहन लेती है और एक बड़ी पालिथीन को चारों और से काटकर देह छुपाती हुई निकल जाती है । रास्ते में जितनी जगह उसे बारिश से बचने के ठइए दिखते है वो कुछ घड़ी ठहरती चलती है और अंत में अपनी टूटी – फूटी और बारिश मे दस जगह से टपकती झुग्गी मे पहुँच जाती है ।
“ हम्म , अब रामवती को यहीं छोड़कर हम लोग वापिस रजूँ महल उड़ चलते हैं , मन बाबू का मन कहता है की आज वहाँ रंजू अहम मुद्दे से दो चार हैं ये विचार आते ही मन बाबू दोगुनी गति से दौड़कर रंजू महल पहुँचते हैं
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येस गर्ल्स आज एक अहम मुद्दा भी मैं तुम लोगों को बताना कहती हूँ – “रामवती की बेटी”
रामवती ???? यही ना तुम्हारी नौकरानी !!!! क्या हुआ इसे “ सुषमा की आंखे जैसे रामवती में अपनी NGO के लिए विषय तलाशने लगीं
हाँ यही रामवती , इसकी बेटी गर्भ से है और होने वाले बच्चे का पिता है उसका खुद का पिता ।
वॉट !! आर यू सिरियस ? सीमा का मुंह खुला रह गया
येस , लगता है बेटे की चाहत ने पागल कर दिया होगा उस हरामखोर को । वंश चलाना है भाई , रामवती को तीन बेटियाँ है और इसी कारण रोज मारपिटाई – गाली गलौच । कहता है ये तीनों मेरी औलाद ही नहीं हैं , तेरे किसी यार की देन हैं । काम का ना काज का नौ मन अनाज का ....साला , .....और देखो इस सबके बाद इसके पति ने ये गुल खिलाया है । तीनों लड़कियों की रामवती शादी कर चुकी है । दो तो अपने ससुराल मे है और तीसरी की शादी को साल भर हुआ है , पर गौना होना बाकी है क्यूंकी लड़की अभी बस 17 की है , एक दो बार आई है रामवती के साथ यहाँ । देह का वर्णन करूँ तो रोने लगोगी तुम सब , उफ़्फ़ .....कहीं से तो उसके शरीर पर लड़की होने के चिन्ह नजर नहीं आते । सिर से पाँव तक सपाट एकदम । इंटा रंग के लाल से सूखे बेजान बाल , सूखा शरीर  । ओह गाड , आंखे तो भट्टा सी एकदम , लगता है जैसे डरी हुई इधर उधर उठने से भी घबराती हैं या ये कह लो  देह के पिंजर में बस आत्मा रूपी चिड़िया कैद है ....
तुम कभी मिली हो उसके पति से ?
नहीं , जरूरत भी नहीं पड़ी और रामवती खुद भी कभी उसके बारे में कोई बात नही करती । हमेशा बस अपनी बेटियों की बाते करती है ।
तो तुम्हें ये सब कैसे मालूम हुआ ?
अरे यार पिछले सात आंठ महीने में कई बार इसका पति ज्यादा पीने से बीमार होता रहा है तो रामवती छुट्टी लेकर जाती रही है । बाकी बाते इसकी बेटी ने ही मुझे बताई है , ये कहाँ मुंह खोलती है ।
ओह , सो सैड ,रंजू तुमने उसे जाने क्यों दिया , उस पर मैं एक लंबी कहानी लिखूँगी । मुझे कल ही उसके घर ले चलो । सोचो, स्त्री पुरुष के खुले सम्बन्धों पर आधारित ये कहानी उसके बाप के घृणित कृत्य का पर्दाफाश करते हुए एक मनोवैज्ञानिक स्तर तक जाएगी । मनोविज्ञान पर आधारित कहानियों के चरम पर पहुँचने की सामर्थ्य है इस कहानी में .... बाप का पहली बार उसके साथ संभोग करना, बाप की इस हरकत को ना रोक पाने की बेबसी , उसके कपड़ों के साथ उसका विश्वास भी चिथड़ा – चिथड़ा होना , फिर कच्ची उम्र मे गर्भावस्था के पड़ावों से गुजरता कोमल शरीर , एक बच्ची की कोख में नन्हें से शिशु का हाथ पैर चलाना और बाप की घृणित इच्छा को अपनी कोख में फलते देखना , और ...और ये डर की अगर मुझे भी लड़की हुई तो क्या होगा ?? क्या बाप के साथ फिर सोना पड़ेगा ? ....उफ़्फ़ , कितना दर्द है – कितनी मानसिक पीड़ा ...कहानी तहलका मचा देगी यार  । विरोधी खेमे में आग लग जाएगी , एक बोल्ड कहानी और वो भी एकदम सच्ची और जानती हो इसके बाद कितने लोग रामवती की मदद को दौड़ पड़ेंगे ? दिन बदल जाएंगे उसके , कहानी मैं लिखूँगी अपने इन दो हाथो से और हजारों हाथ उसकी मदद के लिए उठ खड़े होंगे ” मुग्धा एक सांस में बोल गयी लेकिन उसके अंदर की लेखिका राजकीय सम्मान से लेकर राष्ट्रीय पुरस्कार तक के सपने सजाने लगी
येस मुग्धा , यू आर राइट । आज रात ही मैं भी इस सच्ची और गंभीर समस्या पर नारी विमर्श का गहन अध्ययन प्रस्तुत करते हुए लंबी कविता लिखूँगी , मुझे तो अभी से लिखने के लिए हाथो मे झुरझुरी हो रही है । यू नो ,ऐसे लाचार लोगो की समस्याओं को अपने शब्द देकर उनकी मदद करना मुझे बहुत आत्मिक संतोष देता है और एक कवि का तो काम ही है समसामयिक समस्याओं पर प्रकाश डालना । समाज के अँधेरों को दूर करना । हमारे कंधो पर समाज की गहरी ज़िम्मेदारी है , अगर हम नहीं सामने आएंगे तो कौन आएगा इन मज़लूमों के लिए । देखो ,आजादी की लड़ाई में कैसे कवियों ने एक से एक ओजपूर्ण कविताएं लिख कर सामान्य जन को एकत्रित कर दिया था और हम तो खुद नारी हैं , भला एक औरत के दुख को दूसरी औरत नहीं समझेगी तो कैसे चलेगा समाज ? हम यही सब ठान कर ही तो कलम को अपना हथियार बनाए फिर रहे हैं ...क्यों सुरभि !! अपने अखबार के कल के मुख्य साहित्यिक पृष्ठ पर या संपादकीय में तुम्हें इसे रखना होगा , जरा सुनो तुम सब लोग ये प्रारंभिक पंक्तियाँ मेरे मन में कुलबुला रहीं हैं ----
ओ मेरे बाबुल
मैं तेरी सोन चिरइया
तूने ही मुझे रौंद डाला
क्यूंकी माँ ने ना जन्मा भईया
मैं तेरी सोन चिरइया ...... मानसी द ग्रेट कवियत्री विषय को अपने शब्दों मे मन ही मन सजाने लगी
वाह वाह !!! अप्रतिम , कमाल कर दिया यार । एक क्षण में सालिड शुरुआत ...
भई वाह , सचमुच तुम एक सच्ची कवियित्री हो “ सारी सहेलियाँ एक सुर मे वाह वाह के राग अलापने लगी
ओके.....ओके ,रुको भई ... पहले हमें उन बेचारियों के लिए कुछ करना होगा , रंजू तुम कल ही उन दोनों को लेकर मेरी एनजीओ आ जाओ , उसका मेडिकल करवाकर एक सालिड केस मैं रेडी करवा दूँगी । कुछ चैनल वालों को बुलावा लूँगी और उसका एक छोटा सा इंटरवीयू करवा दूँगी । उसको कहना कोई सड़ा गला सूट पहन कर आए , टीवी मे आने के चक्कर मे मंगई करके कोई नया कपड़ा ना पहन ले , थोड़ी शूटिंग उसकी झुग्गी की भी करवा देंगे जिससे लोगो के सामने आ जाएगा की बेचारी किन हालातों में इस गर्भ को ढो रही है । यू नो , एक ही इंटरवीयू के बाद लोगो से उसकी सहायता के लिए और उसके बच्चे के भविष्य के लिए अच्छा खासा डुनेशन आ जाएगा और लगे हाथ मैं जो अनाथ बच्चो को रखती हूँ अपने आश्रम में उनका भी भला हो जाएगा , आखिर हम सब लोग इन्ही लोगो की सेवा के लिए ही तो इस फील्ड में हैं । डीड यू अंडर स्टैंड माय पॉइंट रंजू “ सुषमा सबसे पहले रंजू को अपनी ओर करना चाह रही थी
येस ग्ल्स , आई अंडर स्टैंड , तभी तो आज की कॉकटेल टी पार्टी रखी है
ओह , थैंक्स गाड , मुझे तो लगा था सूखी – सूखी चाय में ही ......हूँ ....सुरभि जीभ को मुंह मे घुमाते हुए बोली
अरे ऐसे कैसे भई ? अपनी रंजू को तुम क्या समझती हो ? सारे आइटम विदेशी हैं मेरी जान ....हाँ तो ये तय रहा हम सब अपने - अपने क्षेत्रों में इस मुद्दे को सामने लाएँगे , उन दोनों को हमारी जरूरत है , मैं अभी उसके सामने कुछ नहीं कहना चाहती थी ,ये लोअर कलास की सोच तो तुम लोग जानती ही हो , पति ना हुआ देवदूत हो गया ,कितना भी कर लो इनके लिए हमेशा पहले यही सोचेंगे की इसमे हमारा ही कुछ फायदा होगा । पहले मुझे उससे बात करके उसे समझाना पड़ेगा ,तुम लोग को मालूम ही है ये लोग अनपड़ , गँवार होते हैं , इन्हे अपने राइट्स की नालिज नहीं होती ऐसे में कभी भी परेशानी खड़ी कर देते हैं , क्यों मुग्धा ....??? देखो तुम उस पर एक उपन्यासिका लिखोगी , उसका घर विजिट करोगी , रात – दिन एक करके पाण्डुलिपि बनाओगी , प्रकाशक के नखरे सहोगी और फिर अपने ही पैसों से विमोचन करवाकर लेखकों का हुजूम जमा करके समीक्षकों की राय से अवगत करवाओगी, लोगो को चाय नाश्ते के साथ खाना तक खिलाओगी और उस सबके बाद आलोचकों की मार सहोगी , तब जाकर ये मुद्दा हवा में आएगा और लेखक जगत में इतिहास लिखेगा । अपनी स्टोरी से तुम तो रामवती को घर - घर की नायिका बना दोगी , अमर कर दोगी किताबों में और बदले मे तुम्हें क्या मिलेगा ?? ज्यादा से ज्यादा कुछ पुरस्कार , नाम और धनराशि !!!!
हाँ , यार पर कौन कमबख़्त पुरस्कारों के लिए लिखता है , मैं तो लिखती हूँ औरत को समाज में इंसाफ दिलाने के लिए । मुझे बस औरत की आजादी के लिए अपनी कलम को ख़ून मे डूबा कर रखना है । ख़ून से याद आया आजकल माहवारी केन्द्रित बड़ी कविताएं हवा में हैं , क्यों मानसी तुम्हारी भी तो एक कविता बवाल मचाए हुए है जरा सुनाओ यार ....
हाँ ,क्यूँ नहीं ...
आज अठठाईसी दिन पूरे होकर
उन्नत्तीसवाँ दिन है
पेट में दर्द के बादल उमड़ –घुमड़ रहें हैं
सैनेट्री पैड के साथ मैं बह रही हूँ
कतरा – कतरा .....
और मानसी पूरे लय और लोच के साथ अपनी कविता प्रस्तुत करती जाती हैं । एक के बाद एक कविताओं और नारी मुक्ति विमर्श का दौर चल पड़ता है ,इसी बीच सौम्या के अभी नए आए उपन्यास पर भी बात चलती है । आज की नामी महिला उपन्यासकार मुग्धा जहां उस उपन्यास को केवल स्त्री पुरुष सम्बन्धों का व्याख्यान मानती हैं जिससे सौम्या ने सस्ती और जल्द लोकप्रियता हासिल की है , वहीं सौम्या अपने उपन्यास को पूरी तरह से समाज में स्त्री की सेक्स संबंधी समस्याओं का दर्शन कहती हैं ...
वहाँ के माहौल से ऊब रहे मन बाबू का मन कहता है की आज ये दोनों जरूर भिड़ेंगी और ये शुरू ......
अच्छा मुग्धा जी एक तरफ तो आप मेरे उपन्यास को सेक्स का तड़का कह रहीं है वहीं दूसरी ओर आपका वो लास्ट उपन्यास !!!! उसके बारे मे आप क्या कहेंगी ???सौम्या गुस्सा हंसी में चबाती हुई बोली ।
मन बाबू जानते हैं इन दो उपन्यासकारिकाओं का ये बिल्ली युद्ध कहीं भी छिड़ जाना आम माना जा सकता है । फेसबुक पर तो दिन भर जवाबी हमलों के पोस्ट दागे जाते हैं लेकिन सामने सहेली – सहेली का खेल पूरी शालीनता के साथ चलता है ....
हाँ मुग्धा जी , सुनाइये ना अपने उपन्यास का अंत , मैं अभी बीच तक पहुंची हूँ ,सीमा जी भी बहस में चटकारें लेने लगी
मुग्धा जी बड़े धीर गंभीर बोली –
जैसा आप पढ़ ही चुकी होंगी शुरुआत में , नायिका अपने पति के शारीरिक सम्बन्धों को लेकर बेहद परेशान है , रोज रात और अक्सर दिन में भी ये टार्चर वो सह नहीं पा रही है । किसी से कहकर जग हँसाई का पात्र नहीं बनना चाहती । डरती है समाज में अपने माँ बाप की इज्जत के बिखरने से और सब कुछ चुपचाप सहती रहती है । अंदर ही अंदर नायिका की घुटन का ब्योरा लिखते समय मुझे खुद कई बार रोना आ गया , दरअसल इस कहानी की प्रेरणा मेरी एक दूर की चाची हैं । बरबस ही उनका चेहरा , गाँव की यादे , आम के बाग , कच्ची पुंडेरियाँ मुझे सालों पीछे खींच ले जाती हैं । हाय कितना पानी था चाची के चेहरे पर ,रूप रिसता था त्वचा के रोओं से ,चाचा दिन भर दबोचे रहते और इसी डर मे जीते की उनकी लुगाई पर किसी गैर मर्द की नजर ना पड़ जाए । दादा जी तक का उनके कमरे में जाना बैन था ।
                                खैर ...हाँ तो मेरी कहानी की नायिका भी इसी मानसिक और शारीरिक यातना से गुजरते हुए गंभीर बीमार हो जाती हैं । ना दवा का असर और ना दुआ का और हो भी तो कैसे ?? कहीं बच्चे मियां बीवी के सेक्स मे रोड़ा ना बने ये सोचकर वहशी पति 7 बार उसका एबोर्शन करवा देता है । जैसे कोख खाली वैसे मन खाली और जैसे मन खाली तो वैसे देह खाली । मगर वासना का मारा पति उसे उस हालत में भी नहीं छोड़ता है , एक दिन उसकी भूख मिटाने के प्रक्रम में वो प्राण त्याग देती है और पति को पता भी नहीं चलता । सुबह उठकर वो निर्लज पहले उसे कपड़े पहनाता है और फिर मौहल्ले में रोने का तमाशा करता है । यही अंत दिया है मैंने उपन्यास का क्योंकि हर बार समस्या का निदान देना भी ठीक नहीं , पाठक को कहानी के साथ वहाँ लाकर छोड़ो जहां वो खुद समाधान सोचने के लिए अपना सिर धूने ....
भई वाह , मुग्धा जी मान गए आपको , क्या दर्दनाक पीड़ा है नायिका की “ मानसी तालियाँ बजाने लगी तो पीछे पीछे सभी की तालियों की आवाज आने लगी
बस मुग्धा जी एक सालिड सा उपन्यास आप रामवती पर भी लिख दीजिये , मैं आपकी हर संभव सहायता करूंगी बस बाद मे मुझे मत भूल जाइएगा “ रंजू ड्रिंक सर्व करते हुए बोली
अरे ऐसे कैसे भई , तुम तो हमारी जान हो , बस तुम तैयार रहना हम लोग कल सुबह फिर आ रहें हैं चाय पर , बस इस बार कलम और झोला साथ होगा ...क्यों सखियों
हाँ भई हाँ ........एक सुर में सबकी आवाज गूंजने लगी और दूसरी किस्म की चाय का दौर चल पड़ा । इस कामयाब टी पार्टी ने आज अपना अगला पड़ाव चुन लिया था और रामवती की बिटिया का भविष्य भी .......
शराब की बदबू से जब मन बाबू का जी खराब होने लगा तो वो वापिस रामवती की झुग्गी में जा घुसे । खाट पर रामवती की बेटी चौकड़ी मारे बैठी हुई थी । कमर अकड़ाए , गुस्से में लाल आंखे किए वो रामवती को घूर रही थी । उसके सामने एक बीड़ी का बंडल और पान का पुड़ा रखा हुआ था । रह - रहकर रामवती की बेटी शरीर में झुरझुरी लेती हुई , बड़ी सी उबासी लेती थी , फिर सिर को ज़ोर का झटका देकर दाँत पिसती हुई रामवती को घूरने लगती थी । रामवती खाट के ठीक नीचे हाथ जोड़े उकड़ू बैठी हुई थी जैसे क्षमा स्वीकार होने के इंतजार में हो ।  पूरी झुग्गी में बैठने के लिए कोई जगह न पाकर मन बाबू परछती पर लटक गए और नज़ारे का मंथन करने लगे
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बारिश की रात बीती और हल्की धूप की सुबह दरवाजे पर पाँव पसार कर बैठ गयी । रात भर की ठंड से सिकुड़े मन बाबू रामवती के कंधे पर बैठे चूल्हे और धूप की आंच से गर्मी लेने लगे
जल्दी करो बिटिया , उठ जाओ और कुछ खा पी लो ,देरी हो गयी तो मैडम बहुत चिल्लाएंगी
माँ आज मत जाओ , हमें बहुत उल्टी हो रही है , आज हम घर का कोई काम नहीं कर पाएंगे और तुम जानती हो फिर क्या होगा ?
क्या होगा रे ?? अगर आज उसने तुम्हें मारा तो सच तुम्हारी कसम हंसियाँ चला देंगे । बाप के नाम पर वैसे भी ये कलंक ही है
माँ अगर तुम ये हंसिया उस दिन चलाई होती जिस दिन पहली बार .....बिट्टी सिसकने लगी ....माँ हमको पानी सा जा रहा है और जलन भी बहुत है । आज मत जाओ माँ , डिस्पेन्सरी चलते हैं ....बिट्टी का रोना और तेज़ हो गया । वो सिसकती जाती थी और माँ न जाओ भी कहती जाती थी
बिटिया तनिक धीरज धरो , तीसरा माह चल रहा है । अगर बार – बार डिस्पेन्सरी दौड़ेंगे तो आस पास की झुग्गी वालो को शक हो जाएगा
माँ , मत जाओ ना ...वो ...क ... कल फिर बारिश के कारण बापू जल्दी घर आ गए थे , हम सोये थे और वो भी आकर हमारे साथ ....छि ....कल से पेट के निचले हिस्से में बहुत दर्द है ...अब सहा नहीं जा रहा वो सिसकने हुए रिजाई के कोने मुट्ठी में दबोचने लगी , डर से चेहरा सफेद और फिर पीला पड़ने लगा
मन बाबू का दिल भर आया , उन्हे लगा अगर आज इस बच्ची के साथ इसकी माँ नही रुकी तो ये डर से ही मर जाएगी । उन्होने उम्मीद भरी निगाह रामवती पर डाली
आग लगे इस हरामी को ...... मरता भी नहीं ...कीड़े पड़ेंगे इसे....देखना तू बिटिया ...सड़ सड़ कर मरेगा ये ...और तुम चिंता न करो हम इस समस्या का कुछ उपाय जरूर करेंगे , जरूर ..... हाँ जरूर , ये पेट बाहर आने से पहले .... किसी को कुछ पता नहीं चलेगा ... तुम्हारी नैया हम जरूर पार लगाएंगे । ये लो ,ये हल्दी और गुड़ वाला दूध घूंट – घूंट पी लो ,आधे घंटे में आराम आ जाएगा “ सकते में आई रामवती अपने मे खोई बड़बड़ाती हुई अपने काम पर तो निकली लेकिन बीच रास्ते से गली बदल कर अपने पति के पास जा पहुंची ।
sss बसेसरवा यहाँ आइये जरा
अरे तुम यहाँ काहे आई हो ?
तो और क्या करते ? तुम्हारा दिमाग घास चरने जो गया हुआ है । क्या बोले थे हम की बिट्टी के पास तभी जाना जब वहाँ तुम्हारी महरारू हो ?” रामवती पूरे दाँत पीसते हुए आवाज़ दबाकर बोली
जान बुझ कर कुछ नहीं किए हैं । तीसरी बार पूरी करने का कल दिन तक का ही समय था , और का करते ? बोलो ? बसेसर अलग ही बिफर रहा था
वो सब मैं कुछ नही जानती , उसको होश में संभालना जानते हो कितना मुसकिल (मुश्किल) है ? क्या जवाब दोगे सारी ज़िंदगी ? ये होता है बाप ? इतना गुस्सा आ रहा है की क्या कहें
देखो ये सब से हम वैसे ही बहुत परेशान हैं , और ना बकबकाओ ...इस शनिवार सब ठीक से निपट जाए तो पिंड छूटे हमारा ....समझी !!!
हाँ ठीक है , शनिवार की पूरी तैयारी रखना....दो दिन बचा है बस...उ मीट वाले को आज ही कह देना ....एकदम ताजा कलेजी चाहिए
हूँ .... कह देंगे
और हाँ फिर कह रहे हैं किसी को कानो कान खबर नही होनी चाहिए , सारा समान छुपा कर लाना और छुपाकर रखना । दिमाग , आँख और कान खुले रखना । जा रहे हैं अब देर हो रही है “ रामवती सट से गोली की तरह गली से निकली
लेकिन इस बातचीत को सुनकर मन बाबू का मन भूल भुलईया में खो गया । उन्हे कुछ समझ नही आया । माँ और बाप की जो व्याख्या आज तक उन्होने पढ़ी थी ये जोड़ी उसके हिसाब से एकदम रहस्यमयी थी । असमंजस और डर की अनजानी अनुभूति से सारी ठंड जैसे उनके पैर के अंगूठे में जमा हो गयी , शरीर इतना भारी हो गया की वो एक - एक कदम घसीटते हुए रंजू महल पहुंचे । मन बाबू सोचने लगे की सच ही तो कहा है किसी ने मन बावरा होता है , जहां देखो बेमतलब बौराया फिरता है । उफ़्फ़...... “
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रामवती कोठी पहुंची तो उसकी सिट्टी पिट्टी गुल हो गयी , कल वाली सारी मेमसाहब वहीं थी , वो चुपचाप किचन मे जाकर बर्तन साफ करने लगी ।
“ रामवती ssss” रंजू धीरे से उसके पीछे आकर खड़ी हो गयी
“ जी मैडम “
“ मैं कई दिन से तुमको लेकर परेशान हूँ , आखिर दो साल से तुम हमारे लिए इतनी ईमानदारी से काम कर रही हो “
“ मैं समझी नहीं मैडम , कोई गलती हो गयी क्या “
“ अरे नहीं पगली , मैंने कहा न मैं तुम्हारे लिए परेशान हूँ , वो मैं तुम्हारी बेटी को लेकर बहुत चिंतित हूँ , देखो बेटियाँ तो सबकी सांझी होती हैं इसलिए वो मेरी भी बेटी हुई न !!! देखो मैंने सब अरेंज कर लिया है, चलो छोड़ो ये सब अब बाद में कर लेना “
“ क्या मैडम , हमें कुछ समझ नहीं आ रहा “
“ तुम चलो बैठक में ,देखो मेरी सारी सहेलियाँ तुम्हारी मदद के लिए इतनी सुबह ही आ गयी हैं “
रामवती उलझन में आ गयी और बैठक में पसरे वृताकार सोफ़े के एक कोने में सिकुड़ कर बैठ गयी । दृश्य कुछ यूं मालूम होता था जैसे धर्मराज की अदालत में कैदी को पेश किया गया हो
“ बोलो रामवती “ रंजू हल्की सी मुस्कान होंठों पर सजा कर बोली लेकिन रामवती कुछ नहीं बोली
“ ओके हम समझते हैं तुम्हारी तकलीफ , बस तुम्हारी मदद करना चाहते हैं लेकिन उसके लिए सब कुछ जानना भी तो जरूरी है न !! तुम बेझिझक सब बता डालो , हम तुम्हारी बेटी के लिए अच्छे से अच्छा इंतजाम कर देंगे ....हूँ ... समझ रही हो न “ सौम्या आवाज को हमदर्दी से भर कर बोली
जी , पूछिये
अं ... ये बताओ अभी कौन सा महीना है ?
जी किसका ?
तुम्हारी बेटी का ?
व ....वो ....डिस्पेन्सरी के डाक्टर साहब कह रहे थे की तीसरा चल रहा है लेकिन आप सब ये .....क्यूँ ??” रामवती को काटो तो ख़ून नहीं
ओह ! तब तो पेट दिखने लगा होगा
नहीं मैडम, बिटिया बहुत कमजोर है तो अभी कुछ नहीं दिख रहा है लेकिन उसको उल्टी बहुत है , खाने की कमी है
अच्छा - अच्छा वो सब बाद में , ये बताओ उसके बाप ने उसे पहली बार कब रेप किया
जी !!!!!!!!!!
मतलब उससे संबंध कब बनाए ? कब सोया उसके साथ ? और तब तुम कहाँ थीं ?
जी ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ मेमसाब रामवती कुछ असहज महसूस करते हुए बोली
सारी नजरें एक साथ रंजू की ओर उठी और रंजू एकदम बौखला सी गयी , फिर उसने खुद पर कंट्रोल करते हुए प्यार से दाँत भींचते हुए कहा
देखो रामवती हम लोग तुम्हारी बिट्टी की मदद करना चाहते हैं । घबराओ नहीं ।
मैडम ये सब आपसे किसने कहा ? सब गलत है ।
तुम्हारी बेटी जब अभी कुछ दिन पहले आई थी तो उसने मुझे सब बता दिया था , अब तुम बताओ , डरो नही  
नही मैडम.... ये बात नही है , वो आपको यूं ही कुछ और बता रही होगी रामवती को जान बचाना मुश्किल लगने लगा तो वो झट बोली
और मैडम आप ऐसी बाते करेंगी तो उस गरीब की शादी खराब हो जाएगी
शादी ? तुम बौरा गयी हो क्या , वो माँ बनने वाली है और तुम शादी बचाने की बात कर रही हो “ मुग्धा बीच में बोल पड़ी
जी , तो क्या करें ? आप बात ही ऐसी ... म ....मैडम उ बच्चा उसके पति का है “ रमावती की बुद्धि काम करने लगी
अरे पागल ना बनाओ , साल भर पहले उसकी शादी हुई थी तबसे तो वो यहीं है ना ? शादी के लिए तुमने मुझसे 5000 भी लिए थे और अब कह रही हो बच्चा पति का है । तुम्हारी बेटी ने रो रोकर उस शैतान की करतूत मुझे बताई थी उस दिन और तुम उसे बचा रही हो ? देखो एक ही रास्ता है हम लोग हमारी एनजीओ की तरफ से तुम्हारा केस तैयार करेंगे , चारो ओर से मदद जुटाएँगे और जच्चा बच्चा के भविष्य को बचाएंगे
मैडम उसका पति आता जाता रहता है यहाँ
अच्छा sss आता जाता रहता है ? तुम जो हर छोटी – छोटी बात पर पैसा मांगती हो , अपने जमाई के आने पर नहीं मांगोगी ? क्यूँ खेल रही हो अपनी बेटी की ज़िंदगी से ?
हम समझे नहीं मैडम
देखो , हम सब में से कोई कहानी के जरिये , कोई कविता के जरिये तो कोई अखबार के जरिये तुम्हारा दुख लोगो के सामने लाएँगे , समझीं ? ये वाली मैडम हैं ना लाल साड़ी वाली ये पुलिस की मदद और खर्चा , सब कुछ अपनी एनजीओ से करवा देंगी
मैडम sss ये क्या आप लोग हमारी इज्जत उड़ाने की बात कर रही है
अरे ......!!! इज्जत का क्या आचार डालोगी ? सरकार और लोग मदद को सामने आएंगे तो जीवन भर बैठ कर खाना !!! टीवी पर आ जाओगी दोनों वो अलग और सुनो जिसने तुम्हारी फूल सी बच्ची के साथ ये सब किया उसे ऐसे ही जाने दोगी क्या ?” रंजू ने उसे समझाने की कोशिश की लेकिन रामवती की आंखे विरक्त ही रहीं
वो मैडम , हम कल ये सब बात करेंगे , बिटिया की हालत आज ठीक नहीं “ रामवती किसी भी तरह यहाँ से हटना चाहती थी
देखो रामवती गर्भावस्था में कुछ न कुछ तबीयत में लगा ही रहता है , उसे जाने दो और ये सब हम उसी की भलाई के लिए कर रहें हैं । अगर तुम उस राक्षस को बचाओगी तो पुलिस तुमको भी नही छोड़ेगी , समझ रही हो ?
कोई और रास्ता नहीं हो सकता क्या मैडम , की बात बाहर भी न जाए और बिटिया कि समस्या भी हल हो “ पुलिस नामक तीर सीधा रामवती को निशाने पर लगा  
हाँ हम उसका आबर्शन करवा सकते हैं , अभी तो तीसरा महिना ही है “ सुषमा ने उसे सलाह दी लेकिन सभी एक साथ चीख पड़े
अरे ये क्या कह रही हो तुम सुषमा ?? तुम तो कहानी का गला बीच में ही घोंट रही हो । अगर आबर्शन हो गया तो लोग मदद क्यूँ करेंगे ? तुम्हारी एनजीओ का फिर क्या काम ?” मुग्धा जी अपनी कहानी की दुर्घटना होते देख घबरा गयीं ,फिर संभलते हुए बोली
मेरा मतलब इसकी बेटी बहुत कमजोर है और ऐसे में आबर्शन जान का खतरा भी बन सकता है और फिर हम सब तो हैं ही मदद के लिए  …. क्यूँ रामवती जान का रिस्क लोगी क्या उसका ... नही तुम्ही बोलो
क्या बोलें मैडम , हमारे तो एक तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाई
कुछ मत कहो , सिर्फ मानो , जो हम सब कह रहे हैं । मैं कुछ फोलिक एसिड की दवा लाई हूँ उसके लिए ,जाते हुए ले जाना , शुरू के महीनों में यही दी जाती है । कल मैं रंजू मैडम के साथ आऊँगी तुम्हारी झुग्गी में तुम्हारी बिटिया से मिलने , फिर जल्द से जल्द ऐक्शन लेते हैं । ठीक है ना ?” सुषमा जी बोलीं
ठीक है मैडम , वो अब हम काम कर लें ?जल्दी जाना है , बिटिया की तबीयत ठीक नहीं “ रामवती अब भी असमंजस में फंसी थी , उसका तो सारा ध्यान झुग्गी की ओर ही लगा था
हाँ ठीक है जाओ , किचन का काम करके कपड़े धो देना और दाल भात सलाद के साथ बना देना “ रंजू ने उसको जाने का इशारा करते हुए बोला
मैडम कपड़े कल धो देंगे । घर जल्दी .....” उसकी बात को बीच में ही काटकर रंजू बोल पड़ी
कपड़े धो कर जाओ , तुम्हें जल्दी जाना है इसलिए दाल भात कहा , चपाती चिकन नही
रामवती अपना सा मुंह लिए जल्दी जल्दी काम में लग गयी ,बीच - बीच में वो मैडम्स की चाय नाश्ते की डिमांड भी पूरी करती रही ।  सब काम ख़तम करते उसे तीन चार घंटे लग गए , इस बीच मन बाबू सभी स्त्रियों की बातों में बिट्टी की समस्या का हल ढूँढने में उलझे रहे
मैडम , काम हो गया
ठीक है जाओ , कल हम आते हैं
वो मैडम बिटिया की तबीयत ठीक नहीं थी तो मुश्किल ही वो कुछ बना कर खाई होगी , अगर आप कुछ  रुपया दे दें तो रास्ते से उसके लिए खाना लेते जाएंगे
बस यही तो तुम लोगो की आदत होती है , उंगली पकड़ाओ तो बाजू पकड़ लेते हो , बोला न जब पैसों की मदद आएगी तो तुमको ही देंगे और कल आ रहें हैं न हम लोग
ठीक है मैडम “ कहकर रामवती घर की ओर दौड़ पड़ी , रास्ते में उसे ख्याल आते रहे “ एक तरफ ये मदद की बात कर रहें हैं और रुपए देने में बात सुना दी , ये कैसी हमदर्दी है ? हे भगवान !! कहीं किसी मुसीबत में ना फंस जाएँ हम , ये बड़े लोगो की बातें हैं , कल किसने देखा है ? बस शनिवार को सब ठीक से हो जाए तो जान बचे
रामवती के निकलते ही सारी सहेलियाँ एक दूसरे का मुंह देखने लगी
बोलो रंजू अब क्या करना है ? इसे तो मदद की जरूरत ही नहीं है और हम लोग बेकार ही परेशान हो रहे हैं
सीमा उसकी मैनटैलिटी समझने की कोशिश करो , हो सकता है उसे अपने पति का डर हो ? या कुछ और बात ? हमारी एनजीओ में ऐसे कई केस आते हैं । ऐसे में काउन्सलिंग करना होगा पहले
हाँ मुझे भी लगता है सुषमा सही कह रही है , मैंने उसे कहा है की कल हम उसके घर आएंगे लेकिन जाएंगे नही । कल जब वो आएगी तो मै उसे समझाउंगी , हो सकता है की पहली बार में तुम सबके सामने उसे झिझक हो रही हो । “
ओके तो हम सब अब चलते हैं , फोन पर अपडेट देना । कुछ और भी काम पूरे करने हैं । “ सभी सखियाँ रंजू महल से विदा हुई और रंजू ज़ोर की आह भरकर सोफ़े पर गिर गयी ।
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रामवती घर पहुंची तो बिटिया को सोते हुए पाया और मन बाबू अपने मन से मजबूर थे इसलिए दबें पाँव उसके पीछे झुग्गी तक चले आए थे । आहिस्ता से वो बिट्टी के सिरहाने बैठ गए और उसे देखते हुए सोचने लगे की आखिर क्या होगा शनिवार को ? अबार्शन ?? या बिट्टी की ह्त्या ?? आह ! कैसे सोई है मासूम सी ....इसे तो कुछ पता ही नही ...और मन बाबू का ध्यान ज़ोर की आवाज़ से भंग हो गया
ऐ बिटिया उठो हम तुम्हारे लिए चटपटी पकौड़ी लाए हैं , मुंह का स्वाद अच्छा हो जाएगा , उठो !!!
कोई हरकत नहीं हुई ....
उठो बिट्टी
लेकिन इस बार भी आवाज को उत्तर नही मिला
रामवती ने माथा छुआ ,फिर कंबल हटाया तो पहले चौंकी फिर भगवान का शुक्र अदा करने लगी “ आह चलो देसी हल्दी ने अपना चमत्कार शुरू कर दिया , अब दो दिन और फिर काम ख़त्म “
बिस्तर लहू लुहान था , बिटिया होश में नहीं थी
उसने पानी का छींटा देना शुरू किया तो बिटिया ने थोड़ी आँख झपकाई , रामवती ने हौसला देती आवाज में बिट्टी को समझाया ।  
बिट्टी उठो , देखो ये सब ...डरना नहीं , कभी कभी ऐसा हो जाता है ,आओ तुम्हारे कपड़े बदल दें
बिट्टी बेसुध सी रामवती की बाहों में झूल गयी । लटकते फटकते उसने आधे होश में कपड़े बदलवाए । बिस्तर बदलने के लिए रामवती ने उसे नीचे बैठाने की कोशिश की तो वो ढुलक कर जमीन पर ज़ोर से जा गिरी और उसका सिर खाट के पाएँ में धम्म से लगा । बिट्टी मरी आवाज़ में मिमया – मिमया कर रोने लगी । उसके हाथ पाँव कमजोरी और ठंड से थरथरा रहे थे । आंखे बार – बार ऊपर की ओर उलट जाती थी । असहाय अवस्था के इस दृश्य से मन बाबू की ज़ोर की चीख निकल गयी ,बिस्तर की तरह उनका मन भी उस मासूम की दुर्दशा देखकर लहू लुहान हो गया लेकिन रामवती ने यहाँ वहाँ नज़र दौड़ा कर खुद को आश्वस्त किया की कोई आस पास तो नहीं है और फिर झटपट बिस्तर बदल दिया
घंटे भर के बाद झुग्गी अजीबो गरीब आवाजों का ग्रास बनने लगी । मन बाबू घबरा कर परछत्ती के अपने पूर्व स्थान पर सहम कर घुस गए लेकिन उन्हे आवाज का मुख कहीं नजर नहीं आ रहा था । रामवती फटाफट बसेसर का लाया हुआ पउआ गिलास में उलटने लगी । एक तेज़ हुंकार के साथ बिट्टी अपने बिस्तर पर चौकड़ी मारकर बैठ गयी
क्यूँ समधन जी बीड़ी लाई हो ???” बिट्टी का ये बदला रूप देखकर मन बाबू को चक्कर का एहसास होने लगा
हाँ सुककु की माई , तुम्हारी बात टाल थोड़े सकते हैं हम , ये लो सुलगा दिये हैं और ये तुम्हारा पसंद वाला गिलास , तुम्हारे बसेसर लाए हैं “ रामवती बिट्टी के हाथ में बीड़ी और शराब पकड़ाकर खाट के नीचे हाथ जोड़े बैठ गयी
हूँ ....मेरा कहाँ अब तो वो तेरा बसेसरवा है ना , हम खाली सुककु की माई हैं .....हाय मेरा सुककु .....मेरा सुग्गा ....हम तुमको जन्म नहीं दिये थे बेटा लेकिन माँ तो हम ही थे तुम्हारी  “ बिट्टी ज़ोर ज़ोर से मुंडी हिलाकर रोने लगी ,मुंडी हिलाने के प्रक्रम में उसके भूरे बाल कभी मुंह पर तो कभी हवा में झटके खाने लगे , मुंह से ढेर राल गिरने लगी
धीरज धरो बहन जी , वो तो आपका ही बेटा है , जन्म नहीं दिया तो क्या हुआ
चुप......छहतत्री ....तेरा पति कब का मर गया और तू दुनिया को मेरे पति को अपना बताती है “ बिट्टी ने शराब का गिलास रामवती को फेंक कर मारा , जिससे वो सहम गयी
अब कितनी बार ये सब बात करेंगी बहन जी
क्यूँ ना करूँ , तेरी इस लड़की से मेरे सुककु का ब्याह ना हुआ होता तो तू बसेसरवा को निगल पाती ? हमारे मरने के बाद दो महिना भी नहीं रुके तुम लोग ....हाँ ......साल भर पहले मेरे बेटे से अपनी इस छिपकली को ब्याह दिया .... हाय ... इसके पाँव पड़ते ही मैं महिना भर भी ना जी सकी ...और मौका देखकर तूने मेरे पति को खा लिया बिट्टी कमर के बल अपने शरीर को ज़ोर ज़ोर से घूमाने लगी “ मन बाबू मारे डर के ना चीख पा रहे थे और ना कुछ समझ पा रहे थे । उनसे इजाज़त मांगे बिना उनका शरीर उनकी ही छाती में सिमटता जा रहा था
शांत हो जाओ बहन जी , ऐसा कुछ नही है , हम तो खुद ही मजबूर हैं “ रामवती मशीन की तरह यही संवाद दोहराए जा रही थी
नहीं होंगे ..... नहीं जाएंगे .....” चिंघाड़ झुग्गी के तिनके तिनके को सहरा गयी
बिट्टी ने खाट से जमीन पर छलांग लगा दी और सीधे जमीन पर लेटकर इस कोने से उस कोने तक शरीर को कलामांडी खिलाने लगी , रामवती झट से उठकर झुग्गी के दरवाजे पर खड़ी हो गयी । पंद्रह बीस मिनट के बाद बिट्टी शांत हो गयी और बेसुध हो गयी
रामवती ने बाहर से बसेसर को बुलाया और दोनों ने बिट्टी को फिर खाट पर लिटा दिया । दोनों कुछ मिनटों बाद ऐसे सामान्य हो गए जैसे औपचारिक बातचीत के बाद सामान्य हुआ जाता है लेकिन मन बाबू शून्य से हो गए । मैं कहाँ हूँ ....ये सवाल खुद से पूछने लगे ...मैं खुद को यहाँ कहीं नही देख पा रहा हूँ ....क्या इंसान मन विहीन हो चुके हैं ? क्या मेरा अस्तित्व ख़त्म हो रहा है ? सारी रात वो खुद में उलझे रहे , ठंड से काँपते रहे , भीतर ही भीतर रिसते रहे ।
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शनिवार की थोड़ी गर्म थोड़ी नर्म सुबह आ गयी थी । ग्यारह बजे के करीब रंजू सभी कामों से फ्री होकर नाश्ता करने बैठी ही थी की मोबाइल बजने लगा
हैलो ...
हैलो र्ंजु , कैसी हो ?
बढ़िया हूँ सुषमा , तुम कैसी हो ?
एकदम मस्त , तुम्हारा फोन नही आया दो दिन से और ना ही तुमने फिर कुछ बताया रामवती के बारे में
यार वो उस दिन से आई ही नहीं , सारा काम मुझे खुद करना पड़ रहा है और उसका फोन भी स्विच आफ आ रहा है ।
ओह , एक्चुयली मैं सुपर मार्किट आई हुई हूँ और अभी वो रामवती यहाँ से एक बड़ा सा चाकू खरीद कर ले गयी है
ऐसा कैसे हो सकता है ? उसका घर तुम्हारे घर के पास वाली सुपर मार्किट से तकरीबन बीस किलोमीटर दूर है और इस दूरी के बीच दुनिया भर के स्टोर पड़ते हैं । जरूर वो कोई और होगी सुषमा
नहीं रंजू , वही थी , बहुत घबराई हुई लग रही थी , इधर उधर जाने किसको देखती जा रही थी । चाकू कोई नार्मल चाकू नहीं था और एक बड़ा सा थैला लिए हुए थी , मुझे कुछ डाउट हो रहा है
ओके , तो तुम ऐसा करो चार पाँच बजे तक आ जाओ फिर उसके घर चलते हैं
मैं अभी आ जाती हूँ ना , कहीं केस हाथ से ना निकल जाए
नहीं सुषमा अभी मुग्धा आने वाली है और हमें एक किताब के विमोचन में जाना है । चिंता ना करो , ये केस तुम्हारी एनजीओ के पास ही आएगा
ओके , फिर बाय हाँ , शाम को मिलते हैं
हाँ बाय डीयर .......” इस वार्तालाप को सुनकर डायनिग टेबल पर बैठे मन बाबू के हाथ से परांठा छूट गया ,और वो उदास चेहरा लिए सोचने लगे क्यूँ आज मैं इतना घबरा रहा हूँ ,क्या होने वाला है आज ....बड़ा सा चाकू ....उफ़्फ़ बिट्टी ..... शाम को मैं भी जाऊंगा रंजू के साथ ....कब तक डरूँगा वहाँ जाने से
रंजू और मुग्धा किताब के विमोचन कार्यक्रम में व्यस्त थे । विमोशन कक्ष लोगो से खचाखच भरा हुआ था । जाने माने लेखक किताब से संबन्धित अपने वक्तव्य प्रस्तुत कर रहे थे , सवाल और उत्तर विमोचन को रोचक बना रहे थे लेकिन मन बाबू एक पल के लिए भी खुद पर संयम नहीं कर पा रहे थे । उन्होने अपनी कलाई घड़ी देखी तो ढाई बजने को था , उनकी घबराहट बढ़ती जा रही थी और जब वो खुद को काबू नही कर पाए तो पलक झपकते ही रामवती की झुग्गी के दरवाजे पर जा पहुंचे ।
डरते हुए उन्होने दरवाजे को धकेला लेकिन दरवाजा तो अंदर से बंद था । उनकी घबराहट कुछ और बढ़ गयी । उन्होने तेज़ सांस अंदर खींची और दरवाजे की मोरी से अंदर घुस गए । अंदर का नज़ारा देखकर वो तेजी से पीछे हटे और दरवाजे से टकरा गए , उन्हे चक्कर से आने लगे लेकिन वो हिम्मत करके वहीं दरवाजे की कुंडी पर बैठ गए ।
सामने कुर्सी पर बिट्टी लाल साड़ी में सजी धजी बैठी थी । उसकी लाल बालो की मांग में हाथ भर लंबा लाल सिंदूर भरा हुआ था । माथे पर लाल बड़ी बिंदी , होंठो पर लाल लाली , कलाइयों पर ढेर लाल चूड़ियाँ , नाखूनो पर लाल नेलपालिश और हाथ में लाल शराब से भरा काँच का गिलास ......लाल आँखों में नशे के साथ भरा हुआ पानी भी लाल झलक दे रहा था । वो होंठो को आगे की तरफ निकाल कर कभी दाएँ घुमाती थी तो कभी बाएँ .....मन बाबू ने डर कर नजरे बिट्टी से हटाकर झुग्गी में दौड़ाई तो उनका डर से पेशाब निकलते – निकलते बचा ।
जमीन पर एक ओघड़ बैठा हुआ था , तन पर सिर्फ भभूत रमाए , लंबी जटाएँ और खूनी आंखे । रामवती और बसेसर कोने में हाथ जोड़े बैठे थे । ओघड़ के समीप लाल सिंदूर , हल्दी , काली स्याही , लाल और काला कपड़ा , काले उड़द , शराब , कलेजी , सरसों के दाने , एक मटकी और जाने क्या क्या रखा हुआ था । उसके हाथ में एक बड़ा तेज़ चाकू था और सामने जमीन पर सितारे की जैसी लाल आकृति में बड़ा सा चौमुखा दिया जल रहा था , वो भारी आवाज में गरजा ...
हाँ भई , जो उपाय बताए थे वो पूरे किए तुम लोगो ने
हाँ बाबा जी , तीन बार पूरा हो गया और हल्दी के साथ आपकी भभूत भी पाँच दिन लगातार दी है “ बसेसर हाथ जोड़े हुए बोला
हूँ .....बस आज का काम होते ही तुम्हें छुटकारा मिल जाएगा
बाबा , बिट्टी को खून बहुत ........” रामवती झिझकते हुए आँख नीचे करके बोली
पागल है क्या तू माई ? वो ख़ून नही है तेरी समधन है , वो बांझ मरी थी जानती है ना तू , सुककु उसके जेठ का लड़का है , है न ?
हाँ बाबा लेकिन
लेकिन क्या ? इसलिए मैंने तुम्हें कहा था की बसेसर तीन बार उसके साथ संबंध बनाए । वो पति के प्रेम और बच्चे का लालच दिल में लेकर मरी थी । अब उसे पति का प्रेम भी मिल गया और इसकी कोख के बच्चे से माँ बनने का सुख भी । आज उसका अंतिम दिन है , उसकी आत्मा की मियाद पूरी हुई ....बस .......लाओ सामान दो ....घड़ी बीत रही है
बसेसर ने थैले में से एक जिंदा मुर्गा निकाल कर ओघड़ की ओर बढ़ा दिया । ओघड़ ने मुर्गे की गर्दन अमेठ कर एक झटके में चाकू के वार से उसकी गर्दन को धड़ से अलग कर दिया , फिर उसने उसके ताजे ख़ून को एक सकोरे में भरकर पहले एक घूंट बिट्टी को पिलाया और फिर उस ख़ून को मटकी में डाल दिया । नींबुओं की लंबी माला को बिट्टी के गले में कुछ क्षण के लिए डालकर मटकी में डाल दिया । अब मटकी में कलेजी , सरसों के दाने , हल्दी , शराब और बहुत कुछ बिट्टी के मुंह से लगाकर मटकी में डालता रहा , अंत में उसने मटकी का मुंह पहले लाल और फिर काले कपड़े से बांध दिया । मटकी के बाहर लाल सिंदूर और काली स्याही से ग्यारह – ग्यारह टीके बना दिये , कुछ मंत्र बड्बड़ाकर वो फिर गरजा …..
अब हम उतारा शुरू करने जा रहे हैं , कोई बीच में नही बोलेगा , उतारा ख़त्म होते ही ये बिना कुछ बोले और बिना पीछे मुड़कर देखे हम और बसेसर जमना जी में इसको प्रवाहित करने चले जाएंगे । इसके मटकी के जमना जी में डूबते ही आत्मा भी परमलोक को चली जाएगी लेकिन ध्यान रहे बीच में अगर कोई बोला तो आत्मा फिर यही रह जाएगी .....
ओघड़ की बात सुनकर डर से थरथर काँप रहे मन बाबू ने अपने मुंह पर अपनी हथेलियाँ ज़ोर से भींच ली की कहीं उनकी रुलाई की आवाज कोई सुन ना ले
ओघड़ ने धूप और अगर के धुएँ के बीच मटकी को सात बार बिट्टी के पूरे शरीर पर से घुमाया और तेजी से दरवाजे की ओर बढ़ गया । पीछे पीछे बसेसर भी यंत्रवत पुर्जे की भांति चल दिया ।  रामवती ने जैसे ही उनके निकलने के लिए दरवाजा खोला सामने रंजू , मुग्धा और सुषमा खड़े थे । वो झेंप भी गयी और उसका गुस्सा भी सातवे आसमान पर जा पहुंचा । बसेसर और ओघड़ चुपचाप उन्हें घूरते हुए आगे चले गए और रामवती ज़ोर से झुग्गी का दरवाजा बंद करके रंजू के सामने आकर खड़ी हो गयी लेकिन जो वो छुपाना चाहती थी वो उन तीनों ने देख भी लिया और समझ भी गये
कहिए मेमसाहब आप लोग यहाँ ?
तुम दो दिन से क्यूँ नही आई और ये सब क्या है ? रजूँ कुछ चिड़कर बोली
बिट्टी को दो दिन से ख़ून जा रहा है इसलिए नहीं आए ,कल आ जाएंगे और ये सब कुछ नही है । अपनी बेटी को बचाने का उपाय किए हैं बस ....उस पर हमारे दामाद की माँ का भूत सवार हो गया था क्यूंकी हमने उसके पति से शादी की है ।
शादी ????और तुम्हारा पति
उसे मरे तो पाँच साल हो गया । अब आप जाइए , हमारा दिमाग और ना खराब कीजिये । आपके यहाँ काम करते हैं बस उतना ही भर रिश्ता रखिए
देखो तुम .....” रंजू गुस्से में भड़कने ही वाली थी की सुषमा ने उसका हाथ दबा दिया
बहुत अच्छा किया तुमने रामवती , तुम सचमुच एक अच्छी माँ हो । अब तो तुम्हारी समधन की आत्मा को तुम बिट्टी के शरीर से निकलवा चुकी हो और उसकी कोख भी .......लेकिन जरा ये सोचो की इतने दिन उस आत्मा ने बिट्टी को सताया है , उसका शरीर खोखला कर दिया है , है न ?” सुषमा बहुत प्यार से बात को संभालती हुई बोली
हाँ , वो तो है
हाँ तो अब उसे ताकत की चीजों और दवाइयों की जरूरत है , हूँ ,,, एक काम करो ये मेरी दफ्तर का कार्ड है , कल उसे लेकर आ जाओ और डाक्टर उसे देखकर ताकत की दवा दे देंगे
ठीक है “ कार्ड पकड़कर रामवती तेजी से झुग्गी में घुस गयी और उसके ज़ोर से दरवाजा बंद करने से पहले मन बाबू कूद कर सुषमा के पर्स पर बैठ गए
तीनों सहेलियाँ कार में आकर बैठकर बाते करने लगी
सुषमा हमें पुलिस को बुलाना चाहिए , ये लोग ऐसे नही सुधरते “ रंजू गुस्से में थी
नहीं रंजू , जरा दिमाग पर ज़ोर डालो । ये भारत है , यहाँ रोज घर घर में तंत्र मंत्र होते हैं , मंदिरों में त्योहारो के नाम पर मासूम जानवरों की बलि चढ़ा दी जाती है । दूध और देसी घी आस्था के नाम पर पत्थरों पर चढ़ाए जाते हैं और वहीं दूसरी ओर उन्ही मंदिरों के बाहर कई गरीब , भूखे , बीमार लोग दम तोड़ देते हैं लेकिन आस्था , भगवान और भूतों के विश्वास के मारे ये लोग टस से मस नहीं होते । ये पीढ़ियों की मानसिक दासता है सखियों , सालों में नही जाएगी । जिस पुलिस की बात तुम कर रही हो वो खुद आकंठ इस सब में डूबी हुई है ।
तो तुम क्या करना चाहती हो ? “ मुग्धा असमंजस में थी
मदद ....बस मदद उस बच्ची की , तुमने ठीक कहा था रंजू की उसे देखकर रोना आ जाएगा । उसकी एक झलक से मैं घायल हो गयी हूँ । वो आएगी तो उसका ठीक से अबार्शन करवाकर उसे दवाइयाँ दिलवा दूँगी । जानती हो ये आत्मा क्या है ?
क्या ??
मानसिक विकार और दुख । अपनी माँ को किसी गैर मर्द  के साथ देखने से उत्पन्न हुआ गुस्सा जिसने विकार का रूप धारण कर लिया है ।
सुषमा सचमुच तुम मुझे बार – बार चकित कर देती हो , तुम्हारी समझ बहुत अच्छी और दिमाग बहुत तेज़ है ।
नहीं रंजू , ऐसा नही है ये बस अनुभव है
लेकिन मैं मुग्धा के लिए दुखी हूँ , उनके उपन्यास का प्लाट चौपट हो गया । सारी मुग्धा यार
अरे किसने कहा रंजू की प्लाट चौपट हो गया , ये तो धमाकेदार स्टोरी है और भी एकदम सच्ची .....हा हा हा हा हा .............तीनों सहेलियाँ ठहाके लगाकर हंसने लगी और मन बाबू ......???? मन बाबू खुद से कह रहे हैं ........
जब सब काम ये इंसान दिमाग से ही करते हैं तो मेरा यहाँ क्या काम ? फिर क्यूँ किताबें मेरे उल्लेख से भरी पड़ी हैं , हर स्थिति का कर्ता धर्ता मुझे ठहराया गया है  । मेरी शान में अनेक सुरीले गीत , कविताएं और कहानियाँ हैं ? मुझे बागी , शैतान , नटखट , बेरागी , प्रेमी , चंचल और जाने क्या क्या लिखा और कहा जाता है लेकिन सच की दुनिया में सब काम दिमाग से होते हैं ....मन का कोई अस्तित्व नही ....और जो मन की सुने वो बावरे कहलाते हैं .......ठीक है ....फिर मुझे भी लौट जाना चाहिए वहीं जहां ये लोग सूखे फूलों के साथ मुझे रखते हैं .....किताबों में .....मेरा किताब में धड़कना ही इन इन्सानो की असली खुशी है .............
और इस विचार के आते ही मन बाबू विमोचन से बाद मुग्धा के हाथो में सिमटी किताब में समा गए ।

संजना तिवारी
आंध्र प्रदेश