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Sunday, 7 June 2015

धूरी

जाने कब और कैसे
आटे के साथ गुथते-गुथते
सब्जियों के साथ छिलते -कटते
परदों पर झूलते हुए
तस्वीरों पर लटके हुए
एक औरत की धूरी ठहर जाती है...
           
खुद उसे भी पता नहीं चलता
           
की वो कब.....???
           
चादरों में फोल्ड हो गयी
           
लंच बाक्स में पैक हो गयी
           
और........
           
और थालियों में परोस दी गयी
बस कैलेंडर ::::::::::
बदलते चले जातें हैं
रिश्ते फैलते चले जातें हैं
और औरतें......
उबलती रहती हैं
चूल्हे पर दूध के जैसी
             
कभी शिशु की बोतल में
             
भर जाने को
             
तो कभी चाय में
मिल जाने को
             
कभी खीर तो कभी
             
दही हो जाने को
बनी रहती हैं द्वारपाल
उस बिन्दु की सदैव
जो खींचती है रेखा
अतीत को वर्तमान
और वर्तमान को भविष्य बनाने को...
अपनी गंध, त्याग और
प्रेम तपस्या से
युगों- युगों तक महकाने को.....
कुछ जो मचल जाती हैं पंख लगाने को
दृन्ढ़ भावों के रंग जीवन में सजाने को
कोख संग कार्यालय हर भार उठाने को
उड़तीं हैं - गिरतीं हैं - संभलती हैं सदा

धूरी से उठकर धूरी पर टिक जाने को......

नही चाहिए बदलाव

नहीं बदलना चाहती मैं तुम्हें
एक इंच भी
चाहे खुद बदल गई हूँ
सिर से पाँव तक
फिर भी नहीं
बिल्कुल नहीं

जब कभी सोचा ही नहीं
माँ की आदतों को बदलूँ
या पिता को थोड़ा नर्म
माँ के स्पर्श सा कर दूँ
मैंने तो बस आत्मसात किया
उनमे खुद को और
खुद को उनमें जिया
फिर क्यों ????
तुम्हें बदलने का
विचार भी लाऊं ?
जैसे उन्हें निभाया है
तुम्हें भी खुद में समाऊँ । ।
नहीं बदलना चाहती मैं तुम्हें
एक इंच भी ........

माना तुम बहुत
बहुत निष्ठुर हो
मेरे लिए उजालों में भी
अंधेरा ढूंढ लाते हो
तानो से कर देते हो
छलनी मेरा सीना
और सागर भर रुलाते हो
लेकिन फिर भी
नहीं बदलना चाहती मैं तुम्हें
एक इंच भी .......
तुम मेरा वो हिस्सा हो
जो जीवन के कठोर
सचो को मेरे समक्ष
नंगा कर देता है
घृणित हर वस्तु से
रिश्ता पक्का कर देता है
तो क्यों ना जीऊँ
माँ के प्यार और
पिता की छाँव से
तुम्हारे सच्चे अप्रिय
प्रेमरहित वजूद को
हाँ फिर भी
नहीं बदलना चाहती मैं तुम्हें
एक इंच भी .....




कभी कभी

कभी - कभी
दिल कुलबुलाता है.......

अँधेरी उजारी
गलियों में बुलाके
नया संसार रचने को
उकसाता है......

मैं घबराती हूँ
और छटपटाती हूँ
जब तेरा नहीं विशवास
तू नित नए आघात
लगाता है......

फिर क्यों कर
ये संसार साथ निभाएगा
जो रोज नए खुदाओं को
धूप और अगर
चढ़ाता है.....

जब दे घुटनों में सर
दिल अश्रु डूबकी
लगाता है
कोई पीछे से आकर
हर बार मुझे
बुलाता है.......

ले हाथों में हाथ
मेरी पीठ सहलाता है
जलमग्न आँखों में
कुछ दीपक नए
जलाता है......

हौले से रूबरू हो
अपना सुंदर रूप
दिखाता है
पर उसके चेहरे में हरदम
मेरा ही चेहरा
नजर आता है.....

ना समझी मैं नादान
यहाँ कोई नहीं अपना
हर दुःख और
सुख में केवल
तू खुद का साथ
निभाता है......
मेरा दिल ही मुझे
बुलाता है....







इतना भावुक होना भी ठीक नहीं

जब जब सड़को पर देखा है
कोई भूखा बचपन बैठा है
मेरा दिल छलनी सा होकर
आंसुओ की धारा देता है
सच कहती हूँ तुमको हे ईश्वर
इतना भावुक होना भी ठीक नहीं......

जब जब सड़कों के ढाबों पर
कोई नन्हा फूल सुकोमल सा
ढेरों बर्तन के धोता है
जैसे मेरे ही सुकोमल हाथो से
हर लहू का कतरा बहता है
सच कहती हूँ तुमको हे ईश्वर
इतना भावुक होना भी ठीक नहीं......

जब जब माँ बाप के झगड़ो में
निर्मल मासूम निश्छल मस्तिष्क
विक्षिप्त सा बचपन सहता है
मेरे बचपन के कोनों से
हर ख़ुशी का लम्हा रोता है
सच कहती हूँ तुमको हे ईश्वर
इतना भावुक होना भी ठीक नहीं
इतना भावुक होना भी ठीक नहीं








बिकती है वो

टुकड़ो- टुकड़ो में खुद को
लिखती है वो
कहीं किताबों कहीं अखबारों में
बिकती है वो .....।।

उसे नाज़ है अपने
रिसते हुए जख्मों पर
उसे फक्र है अपने
घिसते हुए यौवन पर
तन पे कम कपड़े
आँखों में हया रखती है वो.....
कहीं किताबों कहीं अखबारों में
बिकती है वो.....।।

उसे इतिहास में तुमने कभी
सीता कहा था
उसे ही मान दुर्गा चरणों में
मस्तक धरा था
उसी सम्मान के परचे
यहीं अब सीती है वो.....
कहीं किताबों कहीं अखबारों में
बिकती है वो .....।।

वही जननी वही धरती
वही निज मोह माया
वही जल है वही अग्नि
धरे नित अनुपम काया
नारी से नर को जीवन
युगों -युगों से देती है वो......
कहीं किताबों कहीं अखबारों में
बिकती है वो .....।।

उसे गर जानना चाहो
तो सुन लो '' पुरुष तुम
वासना को त्याग प्रेम लो
अँजुरी में भर तुम
प्रेम और विश्वास की पूंजी
सदा ही भरती है वो......
कहीं किताबों कहीं अखबारों में
बिकती है वो ......।।








प्रबल भाव जल हुए

प्रबल प्रबल प्रबल हुए
ये भाव फिर से जल हुए
बढ़ चलें हवा के संग
जो आज थे वो कल हुए

ना सिंह से गरज पड़े
ना मेघ से बरस पड़े
बिंदु सरुपी देह ले
कीड़ी का धैर्य धर चले
प्रबल प्रबल प्रबल हुए
ये भाव फिर से जल हुए

अंबर सरीखे पुष्ट हो
काली के जैसे रुष्ट हो
धड़ धड़ गिराते जाएंगे
अंगद से हम अचल हुए
प्रबल प्रबल प्रबल हुए
ये भाव फिर से जल हुए

हिमालय से हरे हुए
फल फूल से सजे हुए
हर राम की थाली में हम
शबरी के बेर रख चले
प्रबल प्रबल प्रबल हुए
ये भाव फिर से जल हुए

ये तितलियाँ चहक उठी
लो मछलियां भी उड़ चली
हर नर मगर की कोख में
नारी जलज प्रखर हुए
प्रबल प्रबल प्रबल हुए
ये भाव फिर से जल हुए

शोलों में अश्रु दहकेंगे
सब युवा फिर से बहकेंगे
लिए प्रेम की मशाल ये
भिन्न भिन्न से अब जुगत हुए
प्रबल प्रबल प्रबल हुए
ये भाव फिर से जल हुए









ओ मेरे राम

और नहीं ,अब और नहीं
सुन लो बस अब और नहीं
पूज पाऊँगी तुमको मैं
ओ मेरे राम......
तुम जन्मों के अर्थ हुए
हम जीवन भर व्यर्थ हुए
अटके रहे देह में प्राण
ओ मेरे राम......

बचा लिया था तुमने जब
रावण के मुझे घेरों से
फ़ेंक दिया फिर क्यों मुझको
निर्जन वन के डेरों में
मान बने बस तुम मेरा
पर लव कुश अभिमान हुए
ओ मेरे राम......

आज भी वन में बसती हूँ
अपनी इच्छाएँ डसती हूँ
एक नहीं ढेरों रावण अब
अपनों से भी डरती हूँ
बोलो अब कब आओगे
ख़त्म करने ख़ूनी कोहराम
ओ मेरे राम....

इस बारी जो आओगे
सोच लो फिर ना जाओगे
सीताओं की भीड़ लगी
रावणों की जंजीर कड़ी
धरती माँ की कोख में भी
अब ना बचा मेरा स्थान

ओ मेरे राम........

अमर हूँ

धुँआ धुँआ उड़ती रही मैं
तेरे हर एक कश पर
की फेफड़ों को संभाले रखना
मैं धीमा जहर हूँ

नसों में बहता वो दलदल हूँ
जो धंसा रहा है तुझे-तुझमें
आहिस्ता आहिस्ता

मुझे कोई नाम भी ना देना
की मैं उपजी हूँ
नाजायज कोख से

Don't try to teach me
and feed me because,
मैं जन्म से नवजात नहीं मंथरा हूँ

मुझे मिटाने के सारे प्रयास, ध्यान ,
योगा , सदविचार
'
जीरो' नंबर से फेल हैं

रामायण को रचने वाली
पोसने वाली महाभारत को
दुर्योधन की फटी जंघा का
मांस मैं ही हूँ

मैंने धत्ता बताया है हर कानून,
गांधी के सत्य और अहिंसा को
दो देशों के बीच की तलवार
मैं ही हूँ

मैं तुम्हारी अपनी अजन्मी, पुष्ट,
लालसी ईर्ष्या........
अजर और अमर


युवती

खुद को युवा होते देखना
भर देता है अंगूरी एहसास
हर युवती के हृदय में
प्युपा से रेशम बनने की
ये प्रक्रिया भर देती है
अनेकों कोमल ख्याल
हृदय तल में
शनैः शनैः होता काया
में परिवर्तन
मज़बूर करता रहता है
देखने को दर्पण
केशों का लहरना,
आँखों का झुक जाना
चुपके से देख तिरछे मुस्कुराना
बिना शिक्षा बिना अभ्यास
बन जाता है नियंत्रित व्यवहार
पर कहीं दबे हृदय तल में
दर की जड़ें उभर आती हैं
जिसे ना वो खुद को
ना दूजे को समझा पाती है
रोज़ आती भयानक खबरें
ख्वाबों में उत्पात मचाती हैं
किसे रखवाला कहें, किसे बलात्कारी
विचारों में फंस जाता है
कहीं कोई भाई था,
कोई पिता
कोई सहकर्मचारी
जैसे बन गया – भेड़िया बलात्कारी !!!!!!





राजनेता की देसी मलाई

मैं करती नहीं हूँ
राजनीति की बातें
अजी मुझे
पसंद ही नहीं आती
राजनीति की बातें
पर क्या कहें --------
चुभते है मुझे नेता
बन बन के काँटे  । ।

इनके हाथों में
होती है
चोरी की सफ़ाई
चेहरे पे झूठी रौनक
और मुँह में मिठाई
देख देख नोटो का ख़जाना
विपक्षी दल की जीभ लपलपाई
देखो कैसे कर रहे हैं
एक दूजे की खिचाई
अब तो इनसे तंग आके
बेशर्मी भी शरमाई
और कोप भवन की बीमारी
करा रही
बुजुर्ग नेताओं की जग हंसाई । ।

कुछ नेता नेती मिलके
चाल दोहरी चल रहे
छुटपुट टट्टू पीड़ा में
आख़िर किस किसके बल सहें
ये पासे जाऊँ
किस करवट सो जाऊँ
किकिसको बहुमत दिलाऊँ
और किस-किसको मनाऊँ
क्यूँ न ऐसा चक्र चले
टट्टू से घोड़ा बन जाऊँ
तुम छोटे मोटे पद देते हो
मैं प्रधानमंत्री बन जाऊँ
फिर चाहे किसी मेमसाहब का
कुता ही कहलाऊँ  । ।


इन देश के दामादों का
जनता भी क्या बिगाड़ेगी
अधिकारों की तो समझ नहीं
गूंगे तोते के पंख क्या उखाड़ेगी
जीवन भर करनी होगी
इनको हड्डियों की घिसाई
पैसठ वर्षों में भी हमने  
कुछ बुद्धि ना कमाई
और सुन लो देश वासियों
जो अब भी ना रोकी हमने
अपनी देह की छीलाई
तो रोटी को क्या रोते हो
नेता चूस लेंगें कोख से भी
भ्रूण की सब श्वासे
खा जाएँगे उसका मांस
समझ के मलाई  । ।