टुकड़ो- टुकड़ो में खुद को
लिखती है वो
कहीं किताबों कहीं अखबारों में
बिकती है वो .....।।
उसे नाज़ है अपने
रिसते हुए जख्मों पर
उसे फक्र है अपने
घिसते हुए यौवन पर
तन पे कम कपड़े
आँखों में हया रखती है वो.....
कहीं किताबों कहीं अखबारों में
बिकती है वो.....।।
उसे इतिहास में तुमने कभी
सीता कहा था
उसे ही मान दुर्गा चरणों में
मस्तक धरा था
उसी सम्मान के परचे
यहीं अब सीती है वो.....
कहीं किताबों कहीं अखबारों में
बिकती है वो .....।।
वही जननी वही धरती
वही निज मोह माया
वही जल है वही अग्नि
धरे नित अनुपम काया
नारी से नर को जीवन
युगों -युगों से देती है वो......
कहीं किताबों कहीं अखबारों में
बिकती है वो .....।।
उसे गर जानना चाहो
तो सुन लो 'ऐ' पुरुष तुम
वासना को त्याग प्रेम लो
अँजुरी में भर तुम
प्रेम और विश्वास की पूंजी
सदा ही भरती है वो......
कहीं किताबों कहीं अखबारों में
बिकती है वो ......।।
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