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Sunday, 7 June 2015

मैं दौड़ती हूँ

अक्सर दौड़ती हूँ 
अनजान बियाबान
कंटीले पथरीले
रास्तो पर
लड़ती हूँ 
भयानक 
आवाजों से 
गुजरती हूँ
अंधी गहरी
सुरंगों से
पर हाथ ------????
पर हाथ 
कुछ नहीं आता
मिलती है बस
उधड़ी छिली
देह
खून रिस्ते
जख्म और
फूटे हुए
आँख कान
लेकिन --------
नहीं टूटी है
मेरी आशाएं
मेरी उम्मीदें
मेरा हौसला
मेरी नियति
मैं--------------! ! !
मैं फिर दौडूँगी 
बार-बार 
हजार बार
तब तक
जब तक 
ना छीन
लाऊं तुम्हारी 
खोई हंसी
ना ढूंढ़
लाऊं तुम्हारी
जीने
की आस
और
सम्मान ...........
बस तुम रखना
विश्वास..........






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