मैं करती नहीं हूँ
राजनीति की बातें
अजी मुझे
पसंद ही नहीं आती
राजनीति की बातें
पर क्या कहें --------
चुभते है मुझे नेता
बन – बन के काँटे । ।
इनके हाथों में
होती है
चोरी की सफ़ाई
चेहरे पे झूठी रौनक
और मुँह में मिठाई
देख –देख नोटो का ख़जाना
विपक्षी दल की जीभ लपलपाई
देखो कैसे कर रहे हैं
एक दूजे की खिचाई
अब तो इनसे तंग आके
बेशर्मी भी शरमाई
और कोप भवन की बीमारी
करा रही
बुजुर्ग नेताओं की जग हंसाई । ।
कुछ नेता नेती मिलके
चाल दोहरी चल रहे
छुटपुट टट्टू पीड़ा में
आख़िर किस किसके बल सहें
ये पासे जाऊँ
किस करवट सो जाऊँ
किस–किसको बहुमत दिलाऊँ
और किस-किसको मनाऊँ
क्यूँ न ऐसा चक्र चले
टट्टू से घोड़ा बन जाऊँ
तुम छोटे मोटे पद देते हो
मैं प्रधानमंत्री बन जाऊँ
फिर चाहे किसी मेमसाहब का
कुता ही कहलाऊँ । ।
इन देश के दामादों का
जनता भी क्या बिगाड़ेगी
अधिकारों की तो समझ नहीं
गूंगे तोते के पंख क्या उखाड़ेगी
जीवन भर करनी होगी
इनको हड्डियों की घिसाई
पैसठ वर्षों में भी हमने
कुछ बुद्धि ना कमाई
और सुन लो देश वासियों
जो अब भी ना रोकी हमने
अपनी देह की छीलाई
तो रोटी को क्या रोते हो
नेता चूस लेंगें कोख से भी
भ्रूण की सब श्वासे
खा जाएँगे उसका मांस
समझ के मलाई । ।
No comments:
Post a Comment