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Sunday, 7 June 2015

कभी कभी

कभी - कभी
दिल कुलबुलाता है.......

अँधेरी उजारी
गलियों में बुलाके
नया संसार रचने को
उकसाता है......

मैं घबराती हूँ
और छटपटाती हूँ
जब तेरा नहीं विशवास
तू नित नए आघात
लगाता है......

फिर क्यों कर
ये संसार साथ निभाएगा
जो रोज नए खुदाओं को
धूप और अगर
चढ़ाता है.....

जब दे घुटनों में सर
दिल अश्रु डूबकी
लगाता है
कोई पीछे से आकर
हर बार मुझे
बुलाता है.......

ले हाथों में हाथ
मेरी पीठ सहलाता है
जलमग्न आँखों में
कुछ दीपक नए
जलाता है......

हौले से रूबरू हो
अपना सुंदर रूप
दिखाता है
पर उसके चेहरे में हरदम
मेरा ही चेहरा
नजर आता है.....

ना समझी मैं नादान
यहाँ कोई नहीं अपना
हर दुःख और
सुख में केवल
तू खुद का साथ
निभाता है......
मेरा दिल ही मुझे
बुलाता है....







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