लो आ गयी अष्टमी और नवमी फिर
आज मैं फिर सात्विक हो जाऊँगी
लाल -लाल चुन्नियों में देवी कहलाउंगी
लाल टीकों से तुम रंग दोगे मेरा माथा
दुनिया को सुनाओगे महिषासुर की गाथा
हाथो में कालवे , थाली में चढावे
जिस घर डोलूं , मान बढ़ जावे
मेरे पैरों के निशानों से निहाल हो जाओगे
दौड़ दौड़ थाली में पैर धुलाओगे
गमछे से सुखाकर शीश नवाओगे
'जय माता दी' 'जय माता दी' नारे लगाओगे
और फिर कल.........??????????
कुछ प्यारे भक्तजन.....
मेरे होने पर पछताएंगे
बेटी से ऊपर बेटा
राग गुनगुनाएंगे
कुछ कामी भेड़िये
जीभ लपलपाएंगे
देख कर मौका
जाल बिछाएंगे
और जब लुट जाउंगी मैं
मर जाउंगी मैं
मेरे कपड़ो
मेरी सोच
मेरे शरीर के उभारों
का दोष बतलाएंगे
सारे कायदे
सारे नियम
औरत जात को पढ़ाएंगे
फिर अगले बरस देवी भक्त प्यारे
मुझे बुलाएंगे , जयकारे लगाएंगे
देवी कहकर पलकों पर बिठाएंगे......
Hridaysparshi !
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